राजा वह है जो अपना मालिक स्वयं है। आप तो अपने धर्म, जाति, समाज, विचारों, इच्छाओं व चिंताओं के सेवक हैं।
-दीप त्रिवेदी
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राजा वह है जो अपना मालिक स्वयं है। आप तो अपने धर्म, जाति, समाज, विचारों, इच्छाओं व चिंताओं के सेवक हैं।
-दीप त्रिवेदी
कई लोग शुभ-मुहूर्त के चक्कर में समय-संजोग व परिस्थिति बन जाने के बावजूद ‘‘कर्म’’ को टालते हैं, वहीं अन्य कई संजोग न बनने के बावजूद इस चक्कर में कर्म कर डालते हैं। यह सब अपनी मौत मरने के ‘‘गालीबे-Idea’’ अच्छे हैं।
-दीप त्रिवेदी
जितनी गलती ‘मूर्ख’ बनाने वाले की होती है, उससे कम गलती मूर्ख बनने वाले की नहीं होती। फर्क सिर्फ इतना है कि एक को सजा कानून देता है...जबकि दूसरा सजा स्वतः ही पा लेता है।
-दीप त्रिवेदी
एक सच्चा आस्तिक, नास्तिक-सा भासता है; क्योंकि वह आपके धार्मिक पाखंडों व आपके धर्म के दलालों पर हमले बोलता है। वह भी क्या करे, उसका ईश्वर से Direct Contact जो हो जाता है।
-दीप त्रिवेदी
जन्म एक क्षण है। मृत्यु भी एक क्षण है। इन दोनों के बीच के क्षणों के जोड़ को ही हम जीवन कहते हैं। इस लिहाज से समय वाकई मूल्यवान है। हम अपना समय कहां व किन बातों में गंवा रहे हैं... यह गौर करते ही हमारी सारी समस्याओं का अंत आ सकता है।
-दीप त्रिवेदी
एडीसन से प्रयोग होते हैं इसी से वह एडीसन है। हमें कार्य करने पड़ते हैं, इसीलिए हम असफल हैं। जबकि बुद्ध, कृष्ण व जीसस वे हैं जिनसे सबकुछ हो रहा है।
-दीप त्रिवेदी
बुद्धि यदि आपके जीवन के विचारों का केन्द्र है तो Liver आपके शरीर का केन्द्र है। जैसे बुद्धि बिना उपयोग किए जड़ हो जाती है, वैसे ही लगातार सादा व कम खाने से Liver भी कमजोर हो जाता है।
-दीप त्रिवेदी
हमें न सूरज-चांद उगाने हैं, न गुरुत्वाकर्षण ही सम्भालना है। हमें तो अपने खाये भोजन का खून तक नहीं बनाना है। हमें तो सिर्फ अपने जीवन को आनंद, शांति व सफलता की राह पर लगाना है। क्या यह हास्यास्पद नहीं कि बुद्धिमानी का दावा करने वाले हमसे इतना तक नहीं होता?
-दीप त्रिवेदी
‘‘जागृत-व्यक्ति’’ वो है, जिसकी उपस्थिति में उसके आसपास के मनुष्य ही नहीं, घटनायें व कुदरत भी वही करने को मजबूर हो जाए जो वह चाहता है। ...ऐसा जागृत हो जाना कोई बहुत बड़ी बात नहीं।
-दीप त्रिवेदी
एडीसन ने बिना देश-धर्म की सीमा में बंधे सबका हित चाहा व बल्ब का आविष्कार किया; वह सफल हो गया। बुद्ध व जीसस ने अपने ही धर्म-जाति का विरोध कर सबका हित चाहा और वे भी सदैव के लिये अमर हो गये।
-दीप त्रिवेदी