कोटेशन्स
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‘आत्मग्लानि’ से बढ़कर मनुष्य का विनाशक कोई नहीं। यह आपके विश्वास से लेकर अस्तित्व तक सबको खत्म कर देता है। फिर भी मन के विज्ञान से पूरी तरह अनजान यह धर्मगुरु सिर्फ अपनी दुकानें चलाने हेतु रोज-रोज मनुष्य को पाप-भाव से भरे जा रहे हैं।

-दीप त्रिवेदी

आप मन और जीवन समझना चाहते हैं, तो वह धर्म या विद्यालय नहीं सिखा पाएंगे। उस हेतु तो आपको अपने चारों तरफ घट रही प्राकृतिक घटनाओं को ध्यान से देखना पड़ेगा।

-दीप त्रिवेदी

हमें न सूरज-चांद उगाने हैं, न गुरुत्वाकर्षण ही सम्भालना है। हमें तो अपने खाये भोजन का खून तक नहीं बनाना है। हमें तो सिर्फ अपने जीवन को आनंद, शांति व सफलता की राह पर लगाना है। क्या यह हास्यास्पद नहीं कि बुद्धिमानी का दावा करने वाले हमसे इतना तक नहीं होता?

-दीप त्रिवेदी

‘‘सत्य’’ शारीरिक तौर पर किया कर्म या भावना में बह के किये कर्म का नाम नहीं। सत्य उस कर्म से आये परिणाम का नाम है। किसी ने यदि आपमें सुधार लाने को गाली दी तो उसने गाली दी ही कहां? ...उसने तो आप में सुधार लाने की चेष्टा की।

-दीप त्रिवेदी

जो मनुष्य अपने जीवन के सफलता या असफलताओं की जवाबदारी स्वयं ले...वह धार्मिक। जो यह जवाबदारी पूजा-पाठ, ज्योतिष, वास्तु, परिवार या मित्रों को सौंपे...वह अधार्मिक।

-दीप त्रिवेदी

जीवन में कोई भी वस्तु सिर्फ अच्छी या सिर्फ बुरी नहीं हो सकती। सूर्य जीवन देता है तो कड़ी धूप भी देता है। पानी प्यास बुझाता है तो बाढ़ लाकर तबाही भी मचाता है। अतः वस्तुओं की अच्छाई पकड़कर अपनाने वाला सुखी होता चला जाता है।

-दीप त्रिवेदी

जन्म एक क्षण है। मृत्यु भी एक क्षण है। इन दोनों के बीच के क्षणों के जोड़ को ही हम जीवन कहते हैं। इस लिहाज से समय वाकई मूल्यवान है। हम अपना समय कहां व किन बातों में गंवा रहे हैं... यह गौर करते ही हमारी सारी समस्याओं का अंत आ सकता है।

-दीप त्रिवेदी

आपको हजार काम छोड़ आपके व परम-सत्ता के बीच संवाद स्थापित करना है। संवाद स्थापित होते ही आपके सारे भ्रम टूट जाएंगे। और जिसको कोई ‘‘भ्रम’’ ही न रहा उसे सफलता के शिखर छूने से कौन रोक सकता है?

-दीप त्रिवेदी

Complex की जड़ तुलनात्मक शिक्षाओं के कारण मजबूत होती है । दो वस्तुओं या मनुष्यों की तुलना करने से ज्यादा मूर्खतापूर्ण कार्य इस संसार में दूसरा कोई नहीं।

-दीप त्रिवेदी

आपके पास अपना धर्म है व अपने ईश्वर हैं। आपका अपना एक देश व समाज है। आप शिक्षित भी हैं व मन में हजारों महत्वाकांक्षा लिये जी भी रहे हैं। परिवार व मित्रों के नाम पर आपके अपने हजारों हितैषी भी हैं। समझ नहीं आता फिर जीवन में इतनी असफलता व दुःख क्यों है? कहीं आप कुदरत के परम नियम अकेले आने व अकेले जाने को तोड़ने का अन्जाम तो नहीं भोग रहे?

-दीप त्रिवेदी

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