कोटेशन्स
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हमारे मन रूपी कण में ईश्वर अपने तीनों Dimensions के साथ पूरी दृढ़ता से उपस्थित है।

-दीप त्रिवेदी

हमें धर्म में इतनी रुचि है कि पहले तो जो हमें जगाने आता है, हम उसी को सुला देते हैं। फिर उसी को भगवान बनाकर उसके आसपास ऐसा धर्म रच डालते हैं जिससे हमें हिंसा, ईर्ष्या, पक्षपात, झूठ, छल या दगाबाजी करने में तो कोई बाधा न पहुंचे; पर साथ ही दो-चार पाखंड कर हमें धार्मिक होने का गुमान भी बना रहे।

-दीप त्रिवेदी

जीना, शौक से जीना, आनंदपूर्वक जीना, सफलता की ओर कदम बढ़ाना वगैरह कैसे अधार्मिक हो जाता है? अधर्म की तो शुरुआत ही डर कर वस्तुओं के त्याग करने से होती है।

-दीप त्रिवेदी

हमारे जीवन के सारे दुःख व असफलताओं के पीछे मात्र और एकमात्र कारण हमारी स्वार्थी प्रवृत्ति व उससे पैदा होने वाले हमारे स्वार्थजनित कार्य हैं।

-दीप त्रिवेदी

कभी आपने सोचा कि मान और अपमान में फर्क ही क्या है? मान वह जो दूसरा आपको देता है व अपमान वह जिससे दूसरा कुछ आप में से छीनने की कोशिश करता है। इस तरह दोनों कर्मों का ‘कर्ता’ तो दूसरा ही है... उससे आपका क्या?

-दीप त्रिवेदी

दुनिया का कोई भगवान इतने छोटे मन का नहीं हो सकता कि उसे चापलूसी या पूजा की आवश्यकता पड़ जाए। और ऐसा करने से वह खुश हो जाए या आपका कुछ फायदा करा दे, यह तो संभव ही नहीं। ...ऐसा तो सिर्फ शैतान ही हो सकता है।

-दीप त्रिवेदी

‘भय’ और ‘लोभ’ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक से स्वयं को बचा लो...दूसरे से स्वतः ही छुटकारा मिल जाएगा।

-दीप त्रिवेदी

मनुष्य का बचपना तो यह कि जहां सफलता का श्रेय लेने की उसमें होड़ लगी रहती है, वहीं असफलता का मटका किसी और पर फोड़ने की फिराक में भी वह लगा ही रहता है। परिणाम यह कि कभी भी वह घटना का ठीक से आकलन कर नहीं पाता।

-दीप त्रिवेदी

हम क्या हैं? हम भगवान व जगत के बीच के माध्यम हैं। खुल के समझाऊं तो हम Film के वो परदे हैं जिसका कर्तव्य सिर्फ Producerकी Film को दर्शक तक पहुंचाना है।

-दीप त्रिवेदी

जीना, शौक से जीना, आनंदपूर्वक जीना, सफलता की ओर कदम बढ़ाना वगैरह कैसे अधार्मिक हो जाता है? अधर्म की तो शुरुआत ही डर कर वस्तुओं के त्याग करने से होती है।

-दीप त्रिवेदी

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