धर्मगुरु दुनिया को भ्रमित कर अपनी दुकानें चला रहे, यह तो छोटा गुनाह है। उनका बड़ा गुनाह तो यह कि वे श्रेष्ठ मनुष्यों के गुण व उनकी सोच को दबाकर तथा व्यर्थ के चमत्कारों से उनको जोड़ के अपनी दुकान चला रहे हैं।
-दीप त्रिवेदी