हम भी अजीब हैं व हमारे धर्मगुरु भी। हम सिर्फ अपने अहंकार की पूर्ति हेतु अपने धर्म की अच्छाई सुनने उनके पास जाते हैं, व वे सयाने भी इसका ङ्गायदा उठाते हुए हमारा अहंकार सहलाकर अपनी समृद्धि बढ़ाये चले जाते हैं। इससे हम इतने तो अंधे हो जाते हैं कि हमें अपने धर्म की बुराई व दूसरे धर्मों की अच्छाई ही दिखना बंद हो जाती है। यह आपका कितना बड़ा नुकसान है इसकी आप कल्पना तक नहीं कर सकते।
-दीप त्रिवेदी