‘‘कर्मवाद’’ व ‘‘भाग्यवाद’’ दो समानांतर लकीरें हैं...जो न मिली हैं - ना कभी मिल सकती हैं।
-दीप त्रिवेदी
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‘‘कर्मवाद’’ व ‘‘भाग्यवाद’’ दो समानांतर लकीरें हैं...जो न मिली हैं - ना कभी मिल सकती हैं।
-दीप त्रिवेदी
जीवन में आपके साथ या आपके आसपास कुछ भी ‘‘अप्रत्याशित’’ घटता है तो वह सिवाय आपकी मूर्खता के और कुछ नहीं दर्शाता है।
-दीप त्रिवेदी
धार्मिक शास्त्र हजारों वर्ष पुराने हैं। वे जाने कबसे मनुष्य के उद्धार में लगे पड़े हैं। फिर भी मनुष्य के दुःख-दर्दों को देखते हुए वे पूरी तरह असफल सिद्ध हुए हैं। अब समय आ गया है...जब नये विचारों को अपनाया जाए।
-दीप त्रिवेदी
जीवन में मानसिक तौर पर पागल होने से बचना चाहते हो तो अपने प्रेम व क्रोध को खुला छोड़ दो। ...यह दोनों दबाने से विकृत हो जाते हैं।
-दीप त्रिवेदी
बच्चों को मां-बाप द्वारा सुनायी जाने वाली हजार शिक्षाप्रद कहानियों में राम व श्रवण जैसे आज्ञाकारी बच्चों की कहानियां अक्सर कुछ ज्यादा ही चाव से सुनायी जाती है। कहीं उनमें से कुछ अपने बच्चों की जवानियां खुदके बुढ़ापे पर निछावर करने की छिपी तमन्ना लिए तो नहीं बैठे हैं?
-दीप त्रिवेदी
जीवन साठ वर्ष का है, यह मानकर हम पूरे जीवन को ‘‘एक’’ मानकर जीते हैं। इसी कारण भूतकाल की यादें व भविष्य का डर हमें सताता रहता है। जबकि वास्तव में जीवन खरबों क्षणों के जोड़ का नाम है। अतः हर क्षण-नया क्षण। और जब हर क्षण नया क्षण है...तो कौन-सा भूतकाल व किसका भविष्य?
-दीप त्रिवेदी
हमारे पास अपना सिवाय अपने ‘मन’ के क्या है? बाकी जो भी है वह प्रकृति का दिया हुआ है। और उसे उपयोग करने लायक विज्ञान ने बनाया है। वहीं यदि मन के आनंद की बात की जाए तो वह ‘‘कला’’ में छिपा पड़ा है। समझ नहीं आता कि इस पूरी Process में हमें ‘तथाकथित धर्मों’ की आवश्यकता ही कहां महसूस हो रही है?
-दीप त्रिवेदी
हम कितने कमाल हैं? हमारे पास शेर जैसे पंजे नहीं फिर भी सबको काटने दौड़ते हैं। सांप जैसा जहर नहीं, फिर भी खुन्नसें पालते रहते हैं। पक्षी जैसे पंख नहीं फिर भी कल्पना लोक में उड़ते ही रहते हैं। जब आपमें इन्सानों के कोई गुण ही नहीं तो जीवन में सफलता कैसे पाओगे?
-दीप त्रिवेदी
नफरत व तिरस्कार, फिर चाहे वह वस्तु से हो या व्यक्ति से; ‘हिंदू’ धर्म में कोई स्थान नहीं। ...जबकि यह So-called हिंदू संत आपमें व्यर्थ के ‘पापभाव’ पैदा कर अपने आश्रम फैलाये चले जा रहे हैं। कैसे तो आप हिंदू व कैसे तो यह हिंदू संत?
-दीप त्रिवेदी
हमारे पास अपना सिवाय अपने ‘मन’ के क्या है? बाकी जो भी है वह प्रकृति का दिया हुआ है। और उसे उपयोग करने लायक विज्ञान ने बनाया है। वहीं यदि मन के आनंद की बात की जाए तो वह ‘‘कला’’ में छिपा पड़ा है। समझ नहीं आता कि इस पूरी Process में हमें ‘तथाकथित धर्मों’ की आवश्यकता ही कहां महसूस हो रही है?
-दीप त्रिवेदी